*लिंगो आजा का करसाड़: आत्मपरिवर्तन और जीवन-दर्शन की दिशा*
लिंगो आजा के करसाड़ को लेकर आप लोगों ने कितनी तैयारी की है, यह तो ज्ञात नहीं, किंतु इतना निश्चित है कि इस करसाड़ में जाना प्रत्येक कोया जन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन की दिशा दिखाने वाला वह पेन स्थल है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है—मुझे क्या करना है, किस राह पर बढ़ना है, और मेरे अस्तित्व का उद्देश्य क्या है।हमारे पेन पुरखों ने कभी भी चमत्कारों या कृपा के भरोसे जीवन नहीं जिया। उन्होंने हमें एक सुदृढ़, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन-दर्शन प्रदान किया। यह दर्शन केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक पूर्ण व्यवस्था के रूप में हमारे जीवन में रचा-बसा है—नेंग-नात्तूर की सामाजिक संरचना, गोत्र व्यवस्था की मर्यादा, मंडा और जागा व्यवस्था का संतुलन, बाना-बानी बिरादरी का अनुशासन, नार्र पेन, परगना पेन और कोट पेन की सांस्कृतिक व्यवस्था, गढ़ और कुंडा व्यवस्था की संरचना—ये सभी मिलकर एक सजीव समाज का निर्माण करते हैं।यदि गहराई से देखा जाए, तो हमारे पूर्वजों ने उस ज्ञान को बहुत पहले ही समझ लिया था, जिसे आज आधुनिक विज्ञान E = mc² जैसे सिद्धांतों के माध्यम से व्यक्त करता है। ऊर्जा का संरक्षण, प्रकृति के साथ सहजीविता, और हर तत्व के बीच संतुलन—ये सब हमारे पारंपरिक ज्ञान में पहले से ही समाहित रहे हैं।करसाड़ केवल एक सांस्कृतिक मेला स्थल नहीं, बल्कि आत्मबोध का केंद्र है। यदि आपने पिछले करसाड़ के बाद मुझमें परिवर्तन देखा हो, तो वह इसी अनुभव का परिणाम है। उसी प्रेरणा से मैंने लेखन और साहित्य की दिशा में कदम बढ़ाया। राष्ट्रीय जनजातीय साहित्य महोत्सव में भाग लिया, अपने विचारों को विभिन्न मंचों तक पहुँचाया, प्रमाण-पत्र भी प्राप्त किए—परंतु आत्मसंतोष तब भी नहीं मिला। फिर एक दिन, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मार्ग दिखाया, एक पेनगढ़ में ठोकर लगी—और वहीं से लिंगो आजा का संकेत मिला। साथियों के सहयोग और पेन पुरखों के आशीर्वाद से “कोया बूम : एक समृद्ध ग्राम व्यवस्था” का संपादन संभव हुआ, जो लोगों के बीच चर्चित भी रहा। यह सब किसी व्यक्तिगत क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि उस परंपरा एवं लिंगो आजा का आशीर्वाद है, जो हमें दिशा देती है। यह भी सत्य है कि ज्ञान हर किसी को नहीं बदल सकता। यदि स्वयं लिंगो आजा भी आकर किसी को समझाएँ, तब भी वह व्यक्ति नहीं बदल सकता जो स्वार्थ, कपट, अहंकार, क्षेत्रवाद और पूर्वाग्रह से ग्रसित हो। हमारे पेन पुरखों ने कभी अलगाव को नहीं अपनाया; उन्होंने सबको अपने स्नेह में समेटा, अपने ज्ञान से जोड़ा। वे जानते थे कि मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु मनभेद नहीं होना चाहिए। पेन रूप में वे अपने हर अंश—अपने “दूध और खून”—को पहचानते और अपनाते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जिज्ञासा को मर्यादा में रखें। करसाड़ जैसे पवित्र स्थलों पर हर चीज़ को दिखाना, रिकॉर्ड करना या प्रचारित करना आवश्यक नहीं है। कुछ रहस्य, कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जो केवल महसूस किए जाते हैं—न कि दिखाए जाते हैं।जो लोग यह सोचते हैं कि वे इन परंपराओं का प्रचार-प्रसार करेंगे, तभी लोग उन्हें जानेंगे—तो यह भ्रम है। जिन्होंने इस संसार को ज्ञान की रोशनी दी, उन्हें किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं। जब किसी के भीतर भाव जागता है, तो वह स्वयं ही खिंचा चला आता है—सब कुछ छोड़कर।अतः आप सभी से निवेदन है कि लिंगो आजा के करसाड़ को केवल एक परंपरा न समझें, बल्कि इसे आत्मपरिवर्तन और जीवन की सही दिशा पाने का अवसर मानें। यही वह स्थान है, जहाँ से व्यक्ति अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर प्रकाश की ओर बढ़ सकता है।


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